Thursday, June 25, 2020

पाखंड व अंधविश्वास

भगवान से बड़ा हितेषी कोई नहीं!!

भगवान से बड़ा हितेषी कोई नहीं!!
अवश्य पढ़ें बहुत सुंदर कहानी!!

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।*
*वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।* 
*वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।*
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम  थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
*दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।* 
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
*बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।*
 गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
*उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही  है।*

*गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,.... बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा।  पर तुम्हें कौन ले जाएगा?*

*थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।*
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

*गाय ----समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।* 
*बाघ ----अहंकारी मन है।*
*और*
*मालिक---- ईश्वर/रब का प्रतीक है।* 
*कीचड़---- यह संसार है।*
 और
*यह संघर्ष---- अस्तित्व की लड़ाई है।* 

*किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।*
   
*ईश्वर/रब से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हर क्षण हमारी रक्षा करते है..!!*
   जय जय श्री राधे राधे!!

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Sunday, June 21, 2020

Disclaimer/Note इस ब्लॉग के लिए

Disclaimer/Note : यह मेरे निजी विचार हैं। यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख में लिखे हुए सभी तथ्य पूर्णतया सत्य हो। अतः अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करें। आप इस लेख को पूर्णतया नकार भी सकते हैं। आप इस लेख का प्रयोग/उपयोग सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते।

आरक्षण और सँविधान में जातियों का वर्गीकरण वर्ण निर्धारित करने का पैमाना/मानक नहीं है

बार बार समझाने पर भी कुछ लोग नहीं समझते।
एक बात अच्छी तरह समझ ले।
आरक्षण और सँविधान में जातियों का वर्गीकरण वर्ण निर्धारित करने का पैमाना/मानक नहीं है। अर्थात जिसे sc/st का आरक्षण है तो जरूरी नहीं कि वो शुद्र हो। वो अन्य वर्ण भी हो सकता है।

सँविधान किसी भी चीज़ की शपष्ट परिभाषा नहीं देता। सँविधान की एक धारा/कानून दूसरी धारा/कानुन को काट देती है। गलत साबित कर देती है।

सँविधान मैं इतनी कमियां/छेद है कि इसकी विश्वसनीयता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ये सँविधान किसी भी वर्ग के लिए आइडियल सँविधान नहीं है। ये सभी वर्गो के हित की समान रक्षा नहीं करता। शायद इसलिए अंबेडकर ने कहा था कि अगर मेरे बस में होता तो सँविधान जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होता।

भारत का सँविधान 1858 मैं लागु हुआ था। जो भारत पर राज करने और लूटने के लिए बनाया गया था। 1947 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को पावर ट्रांसफर किया था। भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्रता नहीं मिली थी बल्कि दोनों उपनिवेश बनाये गए थे अर्थात अंग्रेजों के आधीन/गुलाम राज्य। जिसके कारण मजबूरीवश मामूली हेर फेर के बाद 1950 मैं पुनः वही सँविधान लागु कर दिया गया। अंग्रेजों का कथित आज़ादी के बाद भी भारत में नियंत्रण होने के कारण सँविधान को पूर्णतया भंग नहीं किया गया और पुनः वही सँविधान मामूली बदलाव के साथ लागु कर दिया गया।

1858 के सँविधान/कानून आज भी उसी क्रम में आज भी विधमान है। जो 1950 के बाद कानूनों में बदलाव और जो नये कानुन बने हैं वो अलग है।

जो भारत को प्रशासनिक अधिकारी देता/चयन करता है, UPSC का गठन 1926 मैं किया गया। अर्थात अंग्रेजों की व्यवस्था वर्तमान में भी चल रही है।

मुख्य विषय पर अब चलते हैं चर्चा करते हैं।

भारत की पहली जातिगत जनगणना 1931 मैं की गई। अंग्रेजों ने जो जातियां/समुदाय का वर्गीकरण 1931 मैं किया था, सैम/प्रतिलिपि मामूली बदलाव के साथ 1950 मैं लागु कर दिया गया। आप गूगल से 1931 ओर 1950 की लिस्ट डाऊनलोड करके मिलान कर सकते हैं।

अब कॉमन सेंस समझने वाली बात है कि अंग्रेजो ने जो कुछ भी किया/बनाया सँविधान कानुन सब भारत में राज करने और लूटने के उद्देश्य से बनाया था वो कथित आज़ादी के बाद भारत और भारतवासियों के लिए कैसे उपयोगी/लाभप्रद हो सकता है और क्या इसकी विश्वसनीयता पर विश्वास किया जा सकता है।

इसमें एक बात और समझने वाली है कि जो मार्शल कोम/जाति/समुदाय/क्षत्रिय अंग्रेजों के खिलाफ थे, अंग्रेजों ने उनको दबाने/दमन करने के लिए डिप्रेस्ड क्लास, क्रिमिनल क्लास व sc में डाला। ओर उनकी पहचान को खत्म करने का प्रयास किया। जिस कारण वर्तमान मैं भी sc व st मैं लिस्टेड मैक्सिम जाति/समुदाय क्षत्रिय वर्ण से ही सम्बंधित है। 

इसमें एक बात और बताने वाली है कि आरक्षण अंबेडकर की देन नहीं है, आरक्षण अंग्रेजों की देन है। आरक्षण का इतिहास भी आपको गूगल पर मिल जायेगा। अर्थात जो लोग आरक्षण के लिए अंबेडकर को क्रेडिट देते हैं वो लोग मूर्ख है। आरक्षण की व्यवस्था अंग्रेजों की है, अंबेडकर की नहीं है।

अब ये सवाल उठता है कि क्या हमें इस व्यवस्था/सँविधान पर भरोसा करना चाहिए।

नहीं करना चाहिए।

बहुत से कारण है।

एक तरफ सँविधान सबको समानता का अधिकार देता है ओर सँविधान untouchable/अछूत को अमानवीय कहता है। और दूसरी तरफ sc को untouchable/अछूत की संज्ञा/परीभाषा देकर अपनी ही बात को नकार देता है। ये सँविधान है या मज़ाक??

दूसरा सँविधान किसी जाति/समुदाय विशेष को sc की परिभाषा/आरक्षण देता है। ओर दूसरी तरफ सँविधान एक विशेष स्थान/जगह को ही sc की मान्यता देता है अर्थात जंहा सभी वर्णों के लोग sc का आरक्षण लेते हैं। उदाहरण उत्तराखंड का जौनसारी एरिया जंहा सभी वर्णों को sc का आरक्षण प्राप्त है। सँविधान अपनी किसी बात पर नहीं टिकता, जाति/समुदाय/स्थान के अनुसार अपनी परिभाषा बदलता रहता है। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वर्गीकरण समझ आता है किंतु एक ही राज्य/स्थान मैं एक ही जाति/समुदाय अलग अलग वर्गीकृत है, ये समझ के परे है। महाराष्ट्र राज्य में कोली सामान्य sc st sbc ओबीसी सब मैं लिस्टेड है, ये कैसे सम्भव है। हिमाचल में एक रिश्तेदार सामान्य है दूसरा रिश्तेदार sc ये कैसे सम्भव है। उत्तराखंड व UP मैं कोली सामान्य है किंतु असवैधानिक तरीके से UP मैं कोरी ओर उत्तराखंड में असवैधानिक तरीके से sc का आरक्षण दिया जाता है। वोटबेंक के लिए समान/मिलते जुलते जाति/समुदाय को एक बताया जाता है। उन्हें रेवेन्यू रिकॉर्ड में हेर फेर ओर फ़र्ज़ी डॉक्युमेंट बनाकर आरक्षण दिया जाता है। ये क्या व्यवस्था है कानुन/सँविधान कँहा है।

आज भी कई जाति/समुदाय किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में अंकित ही नहीं है, जिसके कारण वे अन्य जाति/समुदायों की पहचान धारण करके आरक्षण लेते हैं। फ़र्ज़ी डॉक्यूमेंट बनाये जाते हैं।

 गुजरात में कोली सामान्य है, फिर ओबीसी OBC मैं सम्मिलित करके आरक्षण दिया गया। UP मैं असवैधानिक तरीके से कुछ जाति/समुदायों को SC मैं लिस्टेड किया जाता है किंतु हाई कोर्ट उसको निरस्त कर देता है। योगी आदित्यनाथ ओर मायावती सरकार ने भी ऐसा किया है। जिसे उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट ने असवैधानिक करार दिया। जिसके पास पॉवर/सत्ता है उसके लिए सँविधान/कानून/नियम ओर नैतिकता कोई मायने नहीं रखते।
अभी मोदी सरकार ने भी बिना किसी योग्यता परीक्षा के सेक्रेटरी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर डायरेक्ट भर्ती कर दी।

धारा 341 व 342 के अनुसार SC/ST मैं वर्गीकृत करने का अधिकार सिर्फ ओर सिर्फ संसद को प्राप्त है किंतु 70-72 साल के बाद भी नेता मुख्यमंत्री मंत्री सँविधान/कानुन को ताक पर रखकर अपनी पावर का दुरुपयोग करते हैं। जब मुख्यमंत्री ही सविधानिक प्रक्रिया को नहीं मानते/जानते तो ऐसे कानुन/सँविधान को प्रमाणिक ओर विश्वसनीय कैसे माना जा सकता है।

सँविधान मैं बहुत से राजपूत/ब्राह्मण आरक्षित श्रेणी में है। यँहा तक की मानद उपाधि प्राप्त राजा भी आरक्षित श्रेणी में है। अर्थात बहुत से राजघराने आरक्षित श्रेणी में है। ये क्या मज़ाक है।

1950 मैं प्रॉपर सर्वे करके पुनः जातिगत जनगणना करके वर्गीकृत क्यों नहीं किया गया क्यों अंग्रेजों की व्यवस्था को ही सर्वमान्य मानकर जस तस लागु कर दिया गया।

कहने को इतना है कि इस पर एक ग्रँथ लिखा जा सकता है, लेकिन समझने वाले के लिए इतना बहुत है। 

अब मुख्य बिंदु पर आते हैं।

कोली/कोली राजपूत/कोली क्षत्रिय अंग्रेजों (1947 से पहले) एवं काले अंग्रेजों (1950 के बाद) के अनुसार सभी आरक्षित श्रेणीयो ओर बाय डिफॉल्ट सामान्य मैं वर्गीकृत है।

यूनिवर्सल ट्रुथ/सार्वभौमिक सत्य ये है, ओर जो एशिया महाद्वीप के सभी देशों में ऑथेंटिक प्रमाण मिलते हैं कि कोली/कोलिय एक विशुद्ध क्षत्रिय वर्ण है। जिसके वेद पुराण महाभारत रामायण सहित समस्त धर्म ग्रंथों मैं शपष्ट ऑथेंटिक प्रमाण मिलते हैं।

अब जो लगभग 90 साल की ओर वर्तमान व्यवस्था है 1931 के बाद को माना जाये या हज़ारों सालो की व्यवस्था को माना जाये। मैं गोरे या काले अंग्रेजों की व्यवस्था को नहीं मानता, क्षत्रिय कोली डीएनए/रक्त को कभी दासता स्वीकार नहीं थी ना है। मैं अपने पूर्वजों की हज़ारों सालो के गौरवशाली इतिहास को धूमिल नहीं कर सकता।

90 साल के लिए हज़ारो सालों के एतिहासिक गौरव को इग्नोर करना या नहीं मानना मूर्खता है।

अब जो वास्तव में जन्म से कर्म से कोली है तो ये उसके डीएनए/रक्त में है कि कभी किसी भी कैसी भी परिस्थिति में कोली ने दासता स्वीकार नहीं की। संघर्ष कोली के डीएनए/रक्त मैं है। अब जिन्होंने/वर्णशंकरो ने हथियार डाल दिये और मन/कर्म से स्वयं को गिरा दिया है। अपने अभिमान/सम्मान को त्याग दिया है, 
जो अपने बाप दादाओ पूर्वजों के सम्मान को कायम रखने के लिए प्रयास नहीं कर सकते, उनको कोली कहलवाने/लिखने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

जो जन्म/कर्म से कोली है, वो 100 फ़ीसदी क्षत्रिय है, ये मायने नहीं रखता की सँविधान/कानुन या वर्तमान व्यवस्था कोली को क्या कहता या क्या समझता है।

जो भी जन्म से कोली है और कर्म से क्षत्रिय है, उसको फर्क नहीं पड़ता कि सँविधान/कानुन व वर्तमान व्यवस्था उसको क्या मानती क्या कहती है।

यही यूनिवर्सल ट्रुथ/सार्वभौमिक सत्य ओर पूर्णतयः सत्य है कि कोली एक मार्शल/क्षत्रिय/जाति/समुदाय है।
Disclaimer/Note : यह मेरे निजी विचार हैं। यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख में लिखे हुए सभी तथ्य पूर्णतया सत्य हो। अतः अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करें। आप इस लेख को पूर्णतया नकार भी सकते हैं। आप इस लेख का प्रयोग/उपयोग सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते।

सूर्य ग्रहण के मानव जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव

कुछ लोग सूर्य ग्रहण के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को अंधविश्वास और पाखंड बता रहे हैं। 

ऐसे लोग समाज में जहर फैलाने का कार्य कर रहे हैं। समाज को बांटने की तुच्छ राजनीति कर रहे हैं, एक को दूसरे के खिलाफ भड़का रहे हैं।

ज्योतिष और पंडितों की बात को छोड़ो विज्ञान को तो मानते हो।

क्वांटम सिद्धांत के बारे में पढ़ें। इससे आपको ज्ञात होगा कि सूर्य ग्रहण का मानव जीवन या पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या प्रभाव पड़ सकता है।

क्वांटम फिजिक्स क्वांटम भौतिकी क्वांटम सिद्धांत के बारे में पड़े तो आपको पता चलेगा कि ये अंधविश्वास है या सत्य है।

Saturday, June 20, 2020

शिव

शिव क्या है।

समस्त ब्रह्मांड, धरती, आकाश, सूर्य, ब्रह्मांड के समस्त तारे, समस्त ग्रह,  समस्त तत्व, समस्त ब्रह्मांड में विद्यमान ऊर्जा, सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा, आत्मा सब कुछ जो सोच है अथवा सोच के परे हैं, शिव है। जो शून्य के परे है वह शिव है। निर्विकार शिव है।

जो साकार है वह भी शिव है जो निराकार है वह भी शिव है। शिव माया, मान अपमान, भय, द्वेष से परे है।
धर्म ग्रंथों में लिखा है कि आकाश स्वयं एक लिंग है, अर्थात यदि ब्रह्मांड का यदि कोई स्वरूप है तो वह लिंग स्वरूप है। विज्ञान भी मानने लगा है कि ब्रह्मांड की आकृति लिंग के समान है। 
अर्थात जो है वह भी शिव है जो नहीं है वह भी शिव है।
विज्ञान भी शिव की व्याख्या/विषय में बात करने लगा है। विज्ञान कहता है सब कुछ डार्क/काला मैटर, डार्क/काली एनर्जी/ऊर्जा से उत्पन्न होता है व एक समय अवधि के उपरांत उसी में विलीन हो जाता है। धर्म ग्रंथ भी शिव और शक्ति को इस समस्त ब्रह्मांड का आधार/स्रोत मानते हैं। हम इस पर गहन अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि जो विज्ञान वर्तमान में सिद्ध कर रहा है, या प्रयास कर रहा है, वह धर्म ग्रंथों में हजारों साल पहले ही लिखा जा चुका है।

ब्लैक होल : 

Beyond Science विज्ञान से परे

धर्म क्या है

Manushya Ishwar ka pratiroop hai. 

जीवन

सुशांत सिंह राजपूत की हत्या या आत्महत्या

आज फिर एक बार सुशांत सिंह राजपूत की फ़िल्म "छिछोरे" देखी। इस फ़िल्म की रिलीज़ डेट 6 सितंबर 2019 थी। 24 मार्च 2020 को भारत में लोक डाउन हुआ। करीब करीब 190 दिन हुये। अब ये सवाल उठता है कि इन छह महीनों में क्या हुआ जो सुशांत सिंह राजपूत नेे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। ओर अगले तीन महीने तो सब बंद था। ना कोई काम/शूटिंग या कोई काम/फ़िल्म मिलने की किसी तरह की कोई आशा थी। इन तीन महीनों में शायद ही कोई शूटिंग हुई हो या किसी एक्टर ने कोई नई फ़िल्म साइन की हो। जँहा तक फ़िल्म बनने रिलीज होने तक या उसके परिणाम आने तक सुशांत सिंह राजपूत इस फ़िल्म में ही व्यस्त होंगे। फ़िल्म सफल होने पर खुश भी हुये होंगे। इस तरह देखा जाये तो ये नहीं लगता कि सुशांत सिंह राजपूत किसी दिमागी परेशानी में थे। मीडिया मैं भी कोई इस तरह की बात/ख़बर नहीं आयी। ना उनके परिवार वालों को ख़बर हुई ना उनके किसी मित्र को ख़बर हुई कि सुशांत सिंह राजपूत किसी दिमागी परेशानी से गुज़र रहे हैं। आश्चर्य है जहाँ बॉलीवुड में कोई छींक भी दे तो ख़बर बन जाती है। जो मीडिया बॉलीवुड के बेडरूमो तक की ख़बर भी पता कर लेती है। उस मीडिया को सुशांत सिंह राजपूत केे विषय मैं पता नहीं चला। किसी को भी कुुुछ पता नहीं ओर सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या कर लेेेते है। बहुत आश्चर्य होता है, जब इस विषय पर सोचता हूँ। आखिर क्या बात हुई जो 34 साल के नोजवान ने आत्महत्या कर ली। किसी भी हत्या आत्महत्या के पीछे जर जोरू ओर जमीन ही होती है। जमीन हो नहीं सकती क्योंकि उन्होंने तो चाँद मैं भी ज़मीन खरीदी थी। घर से भी ठीक ठाक थे।