Thursday, August 27, 2020

संस्था को बनाने का उद्देश्य

माननीय संघ परिवार के सभी सदस्यों को सादर नमस्कार!!🙏

इस संस्था को बनाने का उद्देश्य था। अखंड भारत के समस्त क्षत्रिय कोलियों को एकजुट/संगठित करना और अपने कुल/वंश व पूर्वजों की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना था। किंतु हम विषय से भटक रहे हैं।

मैं पिछले करीब 6-7 सालो से यह कार्य कर रहा हूं, और 2 साल से हम यह पंजीकृत संस्था चला रहे हैं। शुरुआत में जब हम कोली क्षत्रिय या कोली राजपूत लिखते थे, तो विरोध करने वालों की गिनती नहीं थी। कुछ लोग तो मरने मारने पर उतारू हो जाते थे। धमकीया देते थे, गालियां देते थे। ऐसा भी समय आया है जब मुझे धमकियो की रोज सो-सो कॉल आती थी। हमारे क्षत्रिय/राजपूत होने में सबसे ज्यादा प्रॉब्लम गुजरात के क्षत्रियों को थी। मैंने अपना नंबर सार्वजनिक किया हुआ था, जिससे मुझे धमकियों की कॉल आती रहती थी। इस तरह का संघर्ष देश के कई राज्यों में बहुत से क्षत्रिय कोली कर रहे थे। उनमें से मैं भी एक था। धीरे धीरे सभी क्षत्रिय कोली सोच/विचारधारा के लोगो का आपस में संपर्क होने लगा। फिर उन सब को एक मंच पर लाने के सोच/विचार ने एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनाने की प्रेरणा दी। मैने 8 राज्यों के क्षत्रिय कोलियों से बात की और सभी को संस्था बनाने के लिए राजी किया। यह शायद इतिहास में पहली बार ही हुआ है कि कोई राष्ट्रीय स्तर की संस्था फोन पर बात करके व व्हाट्सएप के माध्यम से बनाई गई हो। संस्था की पहली मीटिंग में ही संस्था के पंजीकरण संबंधी संवैधानिक डाक्यूमेंट्स पूरे किए गए थे। अर्थात केवल एक फिजिकल मीटिंग में इस संस्था का निर्माण हुआ। इसमें 8 राज्यों के क्षत्रिय कोली सम्मिलित हुए, और बहुत से क्षत्रिय कोली एक दूसरे से पहली बार मिले। संस्था के निर्माण के बाद हमने इसके माध्यम से अपनी बात समस्त क्षत्रिय कोली समाज को पहुंचाई, और कारवां बढ़ता गया। वर्तमान में अधिकतर भारत से क्षत्रिय कोली डायरेक्ट इनडायरेक्ट संस्था से जुड़े हुए हैं।

जब हमने उत्तराखंड में संस्था की पहली मीटिंग का आयोजन किया तो इस का घोर विरोध किया गया। उत्तराखंड के समस्त शासन प्रशासन से लेकर विधायकों और मुख्यमंत्री तक को इसके विरोध में शिकायत की गई।

संस्था के निर्माण के बाद हमने अन्य क्षत्रिय संस्थाओं से संपर्क करना शुरू कर दिया था। उनको अपने कुल वंश और इतिहास के बारे में जानकारी दी। बहुत से क्षत्रिय अचंभित होते थे, कि क्या कोली भी क्षत्रिय/राजपूत हैं। बहुत से क्षत्रिय/राजपूत तो साफ नकार देते थे। हमारे दृढ़ संकल्प ने उन्हें क्षत्रिय कोली के विषय में सोचनेेे पर मजबूर कर दिया। 

इसी बीच मेरा संपर्क माननीय कुंवर अजय सिंह जी के साथ हुआ। माननीय कुंवर अजय सिंह जी "अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा पंजीकृत" केेे राष्ट्रीय अध्यक्ष है। यह भारत की 1897 में पंजीकृत सबसे पुरानी क्षत्रिय संस्था है। माननीय कुंवर अजय सिंह जी मुझे पुत्र समान स्नेह करते हैं, और मैं भी उन्हें पिता तुल्य मानता हूं। उन्होंने मुझे और हमारी संस्था को बहुत सहयोग किया।

समस्त क्षत्रिय कोली समाज को माननीय कुंवर अजय सिंह जी का आभार व्यक्त करना चाहिए। क्योंकि वह प्रथम क्षत्रिय है, जिन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर समस्त क्षत्रियों के सामने हमें क्षत्रिय कोली राजपूत से संबोधित/सम्मानित किया। कुंवर अजय सिंह जी के प्रयास से ही हमें क्षत्रिय जन संसद में स्थान मिला। क्षत्रिय जन संसद में समस्त भारत के क्षत्रिय जुड़े हुए हैं, और इसमें करीब 50-60 राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय क्षत्रिय संस्थाएं सम्मिलित है। इसी के माध्यम से अन्य राज्यों के क्षत्रियों ने हमारे विषय में जाना।

इसके बाद हम सुखदेव सिंह गोगामेडी जी और अन्य क्षत्रियों के संपर्क में आए। मैंने सुखदेव सिंह गोगामेडी जी से क्षत्रिय कोलियों के विषय में बात की और उन्हें अपना इतिहास बताया। इसके बाद उन्होंने भी हमें क्षत्रियों के समान ही सम्मान दिया। अभी कुछ टाइम पहले करणी सेना के स्थापना दिवस पर हमें भी आमंत्रित किया गया। सभी क्षत्रियों के समान हमारा भी सम्मान किया गया।
इसी तरह अन्य संस्थाओं के पदाधिकारियों से भी बात की गई उन्होंने भी हमें क्षत्रियों के समान सम्मान दिया।

ऐसे ही अपने अपने स्तर पर काेलियों ने संघर्ष किया है, और वर्तमान में भी संघर्ष कर रहे हैं। पिछले कई दशकों से क्षत्रिय संघ सुंदरनगर हिमाचल और गढ़वाल राजपूत सभा उत्तराखंड भी क्षत्रिय कोलीयों के सम्मान के लिए प्रयासरत है। ऐसे ही और भी बहुत सारी संस्थाएं यह कार्य कर रही है।

यह सब कहने का, लिखने का अर्थ यह है कि अभी मंजिल बहुत दूर है। और हम विषय से भटक रहे हैं। और जो भी आज तक हमने प्राप्त किया है वह बहुत संघर्ष के बाद प्राप्त किया है। अब हम जिस स्थिति मैं है, उसको संभाल कर भी रखना है। किसी चीज को प्राप्त करने से मुश्किल उसको मेंटेन करना होता है। 

ये संस्था का ऑफिशियल ग्रुप है। इसमें सिर्फ और सिर्फ समस्त भारत के क्षत्रिय कॊलियों को कैसे एकजुट/संगठित किया जाए, समाज को आगे कैसे बढ़ाया जाए, समाज की उन्नति और विकास कैसे हो, सिर्फ इस विषय मैं चर्चा होनी चाहिए।

जो इस बात को गंभीरता से लें सिर्फ वही इस ग्रुप में रहे। कृपया फालतू की बातें वीडियो अन्य संस्थाओं के विषय में अन्य क्षत्रियों के विषय में बात ना करें। सिर्फ और सिर्फ क्षत्रिय कोली समाज के विषय में बात हो।

भवदीय
ठाकुर विजय सिंह
कार्यकारी अध्यक्ष
अखिल भारतीय क्षत्रिय कोली राजपूत संघ पंजीकृत दिल्ली

Sunday, July 19, 2020

kripya apni details format mai hai

कृपया अपनी डिटेल्स इस फॉरमेट मैं दे।

पुरा नाम :
वंश/कुल/गोत्र :
पिता का नाम :
जन्म स्थान :
जन्मतिथि :
फ़ोन नम्बर :
स्थाई पता :
वर्तमान पता :
व्यवसाय :
व्यवसाय का पता :
मूल स्थान/इतिहास यदि जानकारी हो:

परिवार के सदस्यों की डिटेल्स
नाम सम्बन्ध उम्र व्यवसाय के साथ

डॉक्यूमेंट : आधार कार्ड की कॉपी

हम अखिल भारतीय क्षत्रिय समन्वय मोर्चा की टीम बना रहे हैं

🌹🌹हम "अखिल भारतीय क्षत्रिय समन्वय मोर्चा" की टीम बना रहे हैं। इस संस्था में भारत के सभी आरक्षित अनारक्षित क्षत्रियों में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया जाएगा। अर्थात जो मूल क्षत्रिय किसी भी कारणवंश डीग्रेड हो गए या व्यस्था ने डीग्रेड कर दिए, उन सभी को एकजुट संगठित करना और क्षत्रियों की मुख्यधारा में लाना मुख्य उद्देश्य है।🌹🌹 भारत में आरक्षण, गरीबी के कारण, या मुगलो, अंग्रेजों और वर्तमान व्यवस्था में काले अंग्रेजों के कारण जो सम्मान उन्हें मिलना चाहिए था, वह सम्मान उन्हें नहीं मिल रहा। हम इस सम्मान की लड़ाई को, सभी क्षत्रियों के लिए इस संस्था के माध्यम से लड़ेंगे। पहले हम सिर्फ अपने लिए लड़ रहे थे आप समस्त क्षत्रिय समाज के लिए लड़ेंगे। पहले मुगलों ओर अंग्रेजों ने क्षत्रियों के अस्तित्व को खत्म करने का प्रयास किया। और वर्तमान व्यवस्था भी क्षत्रियों के अस्तित्व को खत्म करने का प्रयास कर रही हैं। क्षत्रिय इतिहास को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। अध्ययन की सामग्री में मुस्लिमों और ईसाइयों का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। ताकि आने वाली पीढ़ियां वास्तविक इतिहास और भारतीय संस्कृति को भूल जाए। इसी इतिहास व संस्कृति को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। अगर इतिहास से क्षत्रियों का इतिहास हटा दिया जाए तो इतिहास मैं कुछ नहीं बचेगा। आप हमेशा जी नहीं सकते, 1 दिन सभी को जाना है, किन्तु हम इतिहास व अपने कुल के नाम में जिंदा रह सकते हैं। जैसे सूर्यवंश, चंद्रवंश, नागवंश आदि। इनकी उत्पत्ति हजारों साल पहले हुई थी, किंतु आज भी इनका नाम लिया जाता है। 🌹🌹

जो भी बंधु इस संस्था और इस टीम का हिस्सा बनना चाहता है। अपने पूर्ण परिचय के साथ मुझे 📞 8470063111 व्हाट्सएप नंबर पर संपर्क करें।🙏🙏

भवदीय
ठाकुर विजय सिंह
कार्यकारी अध्यक्ष
अखिल भारतीय क्षत्रिय समन्वय मोर्चा (पंजी.)

https://www.facebook.com/vijaysinghsarola/

Thursday, June 25, 2020

पाखंड व अंधविश्वास

भगवान से बड़ा हितेषी कोई नहीं!!

भगवान से बड़ा हितेषी कोई नहीं!!
अवश्य पढ़ें बहुत सुंदर कहानी!!

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।*
*वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।* 
*वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।*
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम  थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
*दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।* 
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
*बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।*
 गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
*उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही  है।*

*गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,.... बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा।  पर तुम्हें कौन ले जाएगा?*

*थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।*
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

*गाय ----समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।* 
*बाघ ----अहंकारी मन है।*
*और*
*मालिक---- ईश्वर/रब का प्रतीक है।* 
*कीचड़---- यह संसार है।*
 और
*यह संघर्ष---- अस्तित्व की लड़ाई है।* 

*किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।*
   
*ईश्वर/रब से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हर क्षण हमारी रक्षा करते है..!!*
   जय जय श्री राधे राधे!!

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Sunday, June 21, 2020

Disclaimer/Note इस ब्लॉग के लिए

Disclaimer/Note : यह मेरे निजी विचार हैं। यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख में लिखे हुए सभी तथ्य पूर्णतया सत्य हो। अतः अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करें। आप इस लेख को पूर्णतया नकार भी सकते हैं। आप इस लेख का प्रयोग/उपयोग सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते।

आरक्षण और सँविधान में जातियों का वर्गीकरण वर्ण निर्धारित करने का पैमाना/मानक नहीं है

बार बार समझाने पर भी कुछ लोग नहीं समझते।
एक बात अच्छी तरह समझ ले।
आरक्षण और सँविधान में जातियों का वर्गीकरण वर्ण निर्धारित करने का पैमाना/मानक नहीं है। अर्थात जिसे sc/st का आरक्षण है तो जरूरी नहीं कि वो शुद्र हो। वो अन्य वर्ण भी हो सकता है।

सँविधान किसी भी चीज़ की शपष्ट परिभाषा नहीं देता। सँविधान की एक धारा/कानून दूसरी धारा/कानुन को काट देती है। गलत साबित कर देती है।

सँविधान मैं इतनी कमियां/छेद है कि इसकी विश्वसनीयता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ये सँविधान किसी भी वर्ग के लिए आइडियल सँविधान नहीं है। ये सभी वर्गो के हित की समान रक्षा नहीं करता। शायद इसलिए अंबेडकर ने कहा था कि अगर मेरे बस में होता तो सँविधान जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होता।

भारत का सँविधान 1858 मैं लागु हुआ था। जो भारत पर राज करने और लूटने के लिए बनाया गया था। 1947 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को पावर ट्रांसफर किया था। भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्रता नहीं मिली थी बल्कि दोनों उपनिवेश बनाये गए थे अर्थात अंग्रेजों के आधीन/गुलाम राज्य। जिसके कारण मजबूरीवश मामूली हेर फेर के बाद 1950 मैं पुनः वही सँविधान लागु कर दिया गया। अंग्रेजों का कथित आज़ादी के बाद भी भारत में नियंत्रण होने के कारण सँविधान को पूर्णतया भंग नहीं किया गया और पुनः वही सँविधान मामूली बदलाव के साथ लागु कर दिया गया।

1858 के सँविधान/कानून आज भी उसी क्रम में आज भी विधमान है। जो 1950 के बाद कानूनों में बदलाव और जो नये कानुन बने हैं वो अलग है।

जो भारत को प्रशासनिक अधिकारी देता/चयन करता है, UPSC का गठन 1926 मैं किया गया। अर्थात अंग्रेजों की व्यवस्था वर्तमान में भी चल रही है।

मुख्य विषय पर अब चलते हैं चर्चा करते हैं।

भारत की पहली जातिगत जनगणना 1931 मैं की गई। अंग्रेजों ने जो जातियां/समुदाय का वर्गीकरण 1931 मैं किया था, सैम/प्रतिलिपि मामूली बदलाव के साथ 1950 मैं लागु कर दिया गया। आप गूगल से 1931 ओर 1950 की लिस्ट डाऊनलोड करके मिलान कर सकते हैं।

अब कॉमन सेंस समझने वाली बात है कि अंग्रेजो ने जो कुछ भी किया/बनाया सँविधान कानुन सब भारत में राज करने और लूटने के उद्देश्य से बनाया था वो कथित आज़ादी के बाद भारत और भारतवासियों के लिए कैसे उपयोगी/लाभप्रद हो सकता है और क्या इसकी विश्वसनीयता पर विश्वास किया जा सकता है।

इसमें एक बात और समझने वाली है कि जो मार्शल कोम/जाति/समुदाय/क्षत्रिय अंग्रेजों के खिलाफ थे, अंग्रेजों ने उनको दबाने/दमन करने के लिए डिप्रेस्ड क्लास, क्रिमिनल क्लास व sc में डाला। ओर उनकी पहचान को खत्म करने का प्रयास किया। जिस कारण वर्तमान मैं भी sc व st मैं लिस्टेड मैक्सिम जाति/समुदाय क्षत्रिय वर्ण से ही सम्बंधित है। 

इसमें एक बात और बताने वाली है कि आरक्षण अंबेडकर की देन नहीं है, आरक्षण अंग्रेजों की देन है। आरक्षण का इतिहास भी आपको गूगल पर मिल जायेगा। अर्थात जो लोग आरक्षण के लिए अंबेडकर को क्रेडिट देते हैं वो लोग मूर्ख है। आरक्षण की व्यवस्था अंग्रेजों की है, अंबेडकर की नहीं है।

अब ये सवाल उठता है कि क्या हमें इस व्यवस्था/सँविधान पर भरोसा करना चाहिए।

नहीं करना चाहिए।

बहुत से कारण है।

एक तरफ सँविधान सबको समानता का अधिकार देता है ओर सँविधान untouchable/अछूत को अमानवीय कहता है। और दूसरी तरफ sc को untouchable/अछूत की संज्ञा/परीभाषा देकर अपनी ही बात को नकार देता है। ये सँविधान है या मज़ाक??

दूसरा सँविधान किसी जाति/समुदाय विशेष को sc की परिभाषा/आरक्षण देता है। ओर दूसरी तरफ सँविधान एक विशेष स्थान/जगह को ही sc की मान्यता देता है अर्थात जंहा सभी वर्णों के लोग sc का आरक्षण लेते हैं। उदाहरण उत्तराखंड का जौनसारी एरिया जंहा सभी वर्णों को sc का आरक्षण प्राप्त है। सँविधान अपनी किसी बात पर नहीं टिकता, जाति/समुदाय/स्थान के अनुसार अपनी परिभाषा बदलता रहता है। अलग अलग राज्यों में अलग अलग वर्गीकरण समझ आता है किंतु एक ही राज्य/स्थान मैं एक ही जाति/समुदाय अलग अलग वर्गीकृत है, ये समझ के परे है। महाराष्ट्र राज्य में कोली सामान्य sc st sbc ओबीसी सब मैं लिस्टेड है, ये कैसे सम्भव है। हिमाचल में एक रिश्तेदार सामान्य है दूसरा रिश्तेदार sc ये कैसे सम्भव है। उत्तराखंड व UP मैं कोली सामान्य है किंतु असवैधानिक तरीके से UP मैं कोरी ओर उत्तराखंड में असवैधानिक तरीके से sc का आरक्षण दिया जाता है। वोटबेंक के लिए समान/मिलते जुलते जाति/समुदाय को एक बताया जाता है। उन्हें रेवेन्यू रिकॉर्ड में हेर फेर ओर फ़र्ज़ी डॉक्युमेंट बनाकर आरक्षण दिया जाता है। ये क्या व्यवस्था है कानुन/सँविधान कँहा है।

आज भी कई जाति/समुदाय किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में अंकित ही नहीं है, जिसके कारण वे अन्य जाति/समुदायों की पहचान धारण करके आरक्षण लेते हैं। फ़र्ज़ी डॉक्यूमेंट बनाये जाते हैं।

 गुजरात में कोली सामान्य है, फिर ओबीसी OBC मैं सम्मिलित करके आरक्षण दिया गया। UP मैं असवैधानिक तरीके से कुछ जाति/समुदायों को SC मैं लिस्टेड किया जाता है किंतु हाई कोर्ट उसको निरस्त कर देता है। योगी आदित्यनाथ ओर मायावती सरकार ने भी ऐसा किया है। जिसे उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट ने असवैधानिक करार दिया। जिसके पास पॉवर/सत्ता है उसके लिए सँविधान/कानून/नियम ओर नैतिकता कोई मायने नहीं रखते।
अभी मोदी सरकार ने भी बिना किसी योग्यता परीक्षा के सेक्रेटरी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर डायरेक्ट भर्ती कर दी।

धारा 341 व 342 के अनुसार SC/ST मैं वर्गीकृत करने का अधिकार सिर्फ ओर सिर्फ संसद को प्राप्त है किंतु 70-72 साल के बाद भी नेता मुख्यमंत्री मंत्री सँविधान/कानुन को ताक पर रखकर अपनी पावर का दुरुपयोग करते हैं। जब मुख्यमंत्री ही सविधानिक प्रक्रिया को नहीं मानते/जानते तो ऐसे कानुन/सँविधान को प्रमाणिक ओर विश्वसनीय कैसे माना जा सकता है।

सँविधान मैं बहुत से राजपूत/ब्राह्मण आरक्षित श्रेणी में है। यँहा तक की मानद उपाधि प्राप्त राजा भी आरक्षित श्रेणी में है। अर्थात बहुत से राजघराने आरक्षित श्रेणी में है। ये क्या मज़ाक है।

1950 मैं प्रॉपर सर्वे करके पुनः जातिगत जनगणना करके वर्गीकृत क्यों नहीं किया गया क्यों अंग्रेजों की व्यवस्था को ही सर्वमान्य मानकर जस तस लागु कर दिया गया।

कहने को इतना है कि इस पर एक ग्रँथ लिखा जा सकता है, लेकिन समझने वाले के लिए इतना बहुत है। 

अब मुख्य बिंदु पर आते हैं।

कोली/कोली राजपूत/कोली क्षत्रिय अंग्रेजों (1947 से पहले) एवं काले अंग्रेजों (1950 के बाद) के अनुसार सभी आरक्षित श्रेणीयो ओर बाय डिफॉल्ट सामान्य मैं वर्गीकृत है।

यूनिवर्सल ट्रुथ/सार्वभौमिक सत्य ये है, ओर जो एशिया महाद्वीप के सभी देशों में ऑथेंटिक प्रमाण मिलते हैं कि कोली/कोलिय एक विशुद्ध क्षत्रिय वर्ण है। जिसके वेद पुराण महाभारत रामायण सहित समस्त धर्म ग्रंथों मैं शपष्ट ऑथेंटिक प्रमाण मिलते हैं।

अब जो लगभग 90 साल की ओर वर्तमान व्यवस्था है 1931 के बाद को माना जाये या हज़ारों सालो की व्यवस्था को माना जाये। मैं गोरे या काले अंग्रेजों की व्यवस्था को नहीं मानता, क्षत्रिय कोली डीएनए/रक्त को कभी दासता स्वीकार नहीं थी ना है। मैं अपने पूर्वजों की हज़ारों सालो के गौरवशाली इतिहास को धूमिल नहीं कर सकता।

90 साल के लिए हज़ारो सालों के एतिहासिक गौरव को इग्नोर करना या नहीं मानना मूर्खता है।

अब जो वास्तव में जन्म से कर्म से कोली है तो ये उसके डीएनए/रक्त में है कि कभी किसी भी कैसी भी परिस्थिति में कोली ने दासता स्वीकार नहीं की। संघर्ष कोली के डीएनए/रक्त मैं है। अब जिन्होंने/वर्णशंकरो ने हथियार डाल दिये और मन/कर्म से स्वयं को गिरा दिया है। अपने अभिमान/सम्मान को त्याग दिया है, 
जो अपने बाप दादाओ पूर्वजों के सम्मान को कायम रखने के लिए प्रयास नहीं कर सकते, उनको कोली कहलवाने/लिखने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

जो जन्म/कर्म से कोली है, वो 100 फ़ीसदी क्षत्रिय है, ये मायने नहीं रखता की सँविधान/कानुन या वर्तमान व्यवस्था कोली को क्या कहता या क्या समझता है।

जो भी जन्म से कोली है और कर्म से क्षत्रिय है, उसको फर्क नहीं पड़ता कि सँविधान/कानुन व वर्तमान व्यवस्था उसको क्या मानती क्या कहती है।

यही यूनिवर्सल ट्रुथ/सार्वभौमिक सत्य ओर पूर्णतयः सत्य है कि कोली एक मार्शल/क्षत्रिय/जाति/समुदाय है।
Disclaimer/Note : यह मेरे निजी विचार हैं। यह आवश्यक नहीं है कि इस लेख में लिखे हुए सभी तथ्य पूर्णतया सत्य हो। अतः अपने बुद्धि विवेक का प्रयोग करें। आप इस लेख को पूर्णतया नकार भी सकते हैं। आप इस लेख का प्रयोग/उपयोग सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते।